• भादंसं में लिखित धारा 19 के विवरण का पठन एवं वाचन।
• न्यायाधीश की परिभाषा।
• न्यायाधीश के प्रकार।
• अंतिम निर्णय (डेफिनेटिव जजमेंट) की परिभाषा।
• सिंगल बेंच, डिवीजन बेंच, फुल बेंच और कॉस्टीट्यूशनल बेंच की परिभाषा।
नीचे सम्पूर्ण विवरण दिया गया है, अधिक समझने के लिए ये विडियो देखें:
भादंसं की धारा 19 का सम्पूर्ण विवरण हिन्दी में।
भादंसं में लिखित धारा 19 के विवरण का पठन एवं वाचन:
भारतीय दंड संहिता की धारा 19 के अनुसार, न्यायाधीश शब्द न केवल हर ऐसे व्यक्ति का द्योतक है, जो पद रूप से न्यायाधीश अभिहित हो, किन्तु उस हर व्यक्ति का भी द्योतक है, जो किसी क़ानूनी कार्यवाही में, चाहे वह सिविल हो या आपराधिक, अन्तिम निर्णय या ऐसा निर्णय, जो उसके विरुद्ध अपील न होने पर अन्तिम हो जाए या ऐसा निर्णय, जो किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा पुष्ट किए जाने पर अन्तिम हो जाए, देने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो, अथवा जो उस व्यक्ति निकाय में से एक हो, जो व्यक्ति निकाय ऐसा निर्णय देने के लिए विधि द्वारा सशक्त किया गया हो।
न्यायाधीश की परिभाषा:
जज से हमारा अर्थ केवल उस व्यक्ति से ही नही है जो अधिकारिक रूप से न्यायाधीश के पद पर स्थापित है, जिनके पद का नाम न्यायाधीश है, उन्हें तो न्यायाधीश माना ही जायेगा, साथ ही इनके अतिरिक्त वे व्यक्ति जिनके नाम के साथ न्यायाधीश शब्द भले ही ना जुड़ा हुआ हो, लेकिन यदि विधि के द्वारा उनको ये शक्ति प्रदान की गई हो कि किसी भी लीगल प्रोसिडिंग में जजमेंट दे सकें, चाहे उनके पद का नाम कुछ भी हो - जैसे रेन्ट कंट्रोलर, मजिस्ट्रेट, सिविल जज, प्रिंसिपल जज ऑफ द फैमिली कोर्ट, फैमिली जज या अन्य प्रकार का कोई भी पद।
न्यायाधीश के प्रकार:
निम्न प्रकार के व्यक्तियों को न्यायाधीश ' माना जाता है ..
1. वे लोग जिन्हें विधिवत न्यायाधीश के पद पर नियुक्त किया गया हो।
2. वे लोग जिन्हे कानून के द्वारा यह शक्ति दी गई है कि वे किसी भी लीगल प्रोसिडिंग में जजमेंट दे सकते हैं।
3. इस प्रकार के व्यक्ति जो जजमेंट दे सकते हैं और उनके जजमेंट के विरुद्ध कोई अपील ना की जाये।
4. वे लोग जिनके द्वारा जजमेंट दे दिये जाने के बाद उनसे उच्चतर अधिकारी द्वारा पुष्टि कर दी जाये।
5. वे लोग जो व्यक्ति निकाय के सदस्य हैं, अर्थात डिवीजन बेंच , कॉन्स्टीट्यूशनल बेंच आदि।
डेफिनेटिव जजमेंट (अंतिम निर्णय) की परिभाषा:
इसका अर्थ है जब किसी केस को पुर्णतया: निपटा दिया जाता है। अर्थात फाइनल जजमेंट दे दिया जाता है और वह फैसला दोनों पक्षों पर बाध्यकारी होता है। लेकिन यदि कोई डेफिनेटिव जजमेंट नही देते हैं और उस जजमेंट के विरुद्ध अपील ना की जाये तो वह भी डेफिनेटिव जजमेंट कहलायेगा।
उदाहरण : मान लीजिए किसी मजिस्ट्रेट पदनाम के व्यक्ति ने किसी को सजा सुनाई और दो वर्ष का कारावास दण्डस्वरूप दिया। लेकिन यह फैसला डेफिनेटिव जजमेंट नही है, क्योंकि इसके खिलाफ अपील की जा सकती है। लेकिन यदि इस जजमेंट के विरुद्ध अपील ना की गई, तो ये डेफिनेटिव जजमेंट की श्रेणी में आयेगा। इसी प्रकार यदि किसी न्यायाधीश द्वारा किसी को फांसी की सजा सुनाई गई तो वह उस समय डेफिनेटिव जजमेंट की श्रेणी में आयेगा जब उनसे उपर के अधिकारी द्वारा उस फैसले को कन्फर्म कर दिया जायेगा।
भारतीय न्याय व्यवस्था में पीठ की संरचना:
एक बड़ी पीठ का निर्णय (अधिक संख्या में न्यायाधीशों द्वारा दिया गया) छोटी पीठ के लिए बाध्यकारी होता है। एक बेंच हमेशा विषम संख्या में न्यायाधीशों के साथ गठित की जाती है।
सिंगल बेंच : जज और अदालतों की संख्या बढ़ने के बाद सुप्रीम कोर्ट में सितंबर 2019 में नया नियम लागू किया गया। सुप्रीम कोर्ट में एकल पीठ (सिंगल बेंच) का गठन किया गया। जमानत, अग्रिम जमानत और केस को ट्रांसफर करने की याचिका पर सिंगल जज की बेंच सुनवाई करती है। सितंबर 2019 तक सुप्रीम कोर्ट में एकल जज पीठ का प्रावधान नहीं था। यहां डिवीजन बेंच यानी खण्डपीठ ही होती थी। ये व्यवस्था सुप्रीम कोर्ट में कार्य की गति को बढ़ाने के लिए की गई। सुप्रीम कोर्ट की सिंगल बेंच (एकल पीठ) का गठन चीफ जस्टिस द्वारा किया जाता है।
डिवीजन बेंच : दो या तीन जजों की बेंच को डिवीजन बेंच कहा जाता है।
फुल बेंच : तीन या पांच जजों की बेंच को फुल बेंच कहा जाता है।
कॉंस्टीट्यूशनल बेंच : पांच या सात न्यायाधीशों की पीठ को संवैधानिक पीठ (कॉंस्टीट्यूशनल बेंच) कहा जाता है।
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