रेलवे स्टेशनों के बोर्ड पर 'समुद्र तल से ऊंचाई' (Mean Sea Level) क्यों लिखी होती है?
अक्सर जब हम ट्रेन से यात्रा करते हैं, तो रेलवे स्टेशनों के नाम वाले पीले बोर्ड पर स्टेशन के नाम के साथ-साथ 'समुद्र तल से ऊंचाई' (Mean Sea Level) लिखी हुई देखते हैं। कई लोगों के मन में यह सवाल आता है कि आखिर यात्रियों के लिए इस जानकारी का क्या काम है? वास्तव में, यह जानकारी आम यात्रियों के लिए नहीं, बल्कि रेलवे के सुचारू और सुरक्षित संचालन से जुड़े इंजीनियरों और लोको पायलटों के अप्रत्यक्ष उपयोग के लिए होती है।

समुद्र तल की ऊंचाई लिखने के मुख्य कारण
- सिविल इंजीनियरों के लिए रेफेरेंस पॉइंट: यह बोर्ड मुख्य रूप से सिविल इंजीनियरों के लिए एक संदर्भ बिंदु (Reference Point) के रूप में काम करता है। रेलवे स्टेशन और पटरियों के निर्माण के समय ही यह ऊंचाई अंकित कर दी जाती है ताकि भविष्य में ट्रैक के रखरखाव और निर्माण कार्यों में सटीक माप लिया जा सके।
- ईंधन (कोयला/डीजल) की खपत का आकलन: हर ट्रेन में कोयले या डीजल की खपत का एक निश्चित राशन चार्ट बना होता है। यह चार्ट विभिन्न स्टेशनों की सापेक्षिक ऊंचाई (Relative Altitude) के आधार पर ही तैयार किया जाता है। चढ़ाई पर ट्रेन को अधिक ऊर्जा चाहिए होती है, और यह गणना समुद्र तल की ऊंचाई पर निर्भर करती है।
जहाँ तक ट्रेन ड्राइवर (लोको पायलट) की बात है, तो वे ट्रेन चलाते समय स्टेशन पर लगे ऊंचाई वाले बोर्ड को नहीं देखते हैं। इसके बजाय, वे पटरी के बगल में लगे ग्रेडिएंट पोस्ट (Gradient Post) पर नज़र रखते हैं। इन पोस्ट्स पर 100, 200, 400 या 1000 इत्यादि अप/डाउन एरो (up/down arrow) के निशान बने होते हैं, जो चढ़ाई या ढलान की सटीक जानकारी देते हैं। जहाँ पटरी बिल्कुल समतल होती है, वहाँ 'L' (Level) लिखा होता है।
ग्रेडिएंट और घाट सेक्शन का गणित: एक उदाहरण से समझें
ड्राइवरों को अधिकतम ग्रेडिएंट की जानकारी पहले से ही होती है, जिसे रूलिंग ग्रेडिएंट (Ruling Gradient) कहा जाता है। इसे समझने के लिए मान लें कि तीन लगातार स्टेशन 'अ', 'ब' और 'स' हैं, जो 10-10 किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं:
- स्टेशन 'अ' की ऊंचाई = 100 मीटर
- स्टेशन 'ब' की ऊंचाई = 100 मीटर
- स्टेशन 'स' की ऊंचाई = 160 मीटर
इस स्थिति में, स्टेशन 'अ' से 'ब' तक ट्रैक बिल्कुल समतल (Level) रहेगा। लेकिन स्टेशन 'ब' से 'स' के बीच ऊंचाई बढ़ रही है। इसकी चढ़ाई (Rising Gradient) की गणना इस प्रकार होगी: (160-100) / (10 x 1000) = 6/1000 या 1/166
यह 1/166 की चढ़ाई सामान्य रूप से अनुमत ग्रेडिएंट 1/200 से अधिक है। इसलिए, जब ट्रेन 'ब' से 'स' की ओर जाएगी, तो पीछे से धक्का देने के लिए एक अतिरिक्त बैंकिंग लोको (Banking Loco) की आवश्यकता पड़ेगी। ऐसे क्षेत्रों को सामान्यतया घाट सेक्शन (Ghat Section) कहा जाता है।
ढलान पर गति नियंत्रण और ऊर्जा खपत
जब ट्रेन स्टेशन 'स' से वापस 'ब' की ओर आएगी, तो उसे 1/166 की ढाल (Downward Slope) मिलेगी। ऐसे में ड्राइवर बेहद सावधान रहेगा और गति को नियंत्रित रखेगा। इन विशेष जगहों पर ट्रेनों की गति सीमा काफी कम कर दी जाती है।
उदाहरण: दिल्ली-कलकत्ता वाया गया-कोडरमा मार्ग के आसपास गुरपा-गुझण्डी ऐसा ही एक घाट सेक्शन है। यहाँ 130 किमी/घंटा की रफ्तार से चलने वाली राजधानी एक्सप्रेस भी 65 किमी/घंटा की गति से चलती है, और मालगाड़ियों की गति तो इससे भी कम कर दी जाती है।
ईंधन और ऊर्जा पर प्रभाव: वाष्प (स्टीम) इंजन के दौर में, यदि समतल या ढलान पर 1 टन कोयला लगता था, तो चढ़ाई वाले रास्ते पर ईंधन की खपत बढ़ जाती थी। यदि पर्याप्त कोयला नहीं दिया गया, तो ट्रेन बीच रास्ते में ही खड़ी हो सकती थी। वर्तमान में डीजल इंजनों में भी इसी आधार पर तेल की गणना की जाती है। हालांकि विद्युत (Electric) लोकोमोटिव में ईंधन खत्म होने की समस्या नहीं होती, लेकिन विद्युत खपत पर नज़र रखने के लिए इन्ही आकलनों का उपयोग किया जाता है।
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